10 पर्सेंट कस्टम ड्यूटी करने की मांग

नई दिल्ली  : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम पिछले पांच वर्षों के निचले लेवल पर आ जाने के बीच नेचुरल रबड़ के दाम भी लगभग 50 पर्सेंट घटे हैं, लेकिन टायर कंपनियां अपने प्रॉडक्ट्स की कीमतें नहीं घटा रही हैं। इसे देखते हुए टायर डीलर्स और ट्रांसपोर्ट संगठनों ने अपनी बजट पूर्व सिफारिशों में वित्त मंत्री अरुण जेटली से मांग की है कि विदेश से आयात होने वाले टायर पर लागू 10 पर्सेंट कस्टम ड्यूटी और एंटी-डंपिंग ड्यूटी खत्म की जाए। इससे आयात सस्ता होगा और देसी कंपनियों को भी अपने दाम कॉम्पिटीटिव लेवल पर लाने होंगे।
ऑल इंडिया टायर डीलर्स फेडरेशन (एआईटीडीएफ) की ओर से जेटली को भेजी गई मांगों के साथ यह शिकायत भी की गई है कि साल 2010 और 2013 के बीच कमर्शियल ट्रक-बस का एक जोड़ा टायर 24,500 रुपये का था, जो 2013 के अंत तक 34,300 रुपये का हो गया। इसी तरह मीडियम और लाइट व्हीकल्स के टायरों का दाम 14000 से 21000 रुपये हो गया। टायर कंपनियों ने इस महंगाई के पीछे नेचुरल रबड़ की कीमतें इस अवधि में 242 रुपये प्रति किलो के पीक लेवल तक पहुंच जाने को आधार बनाया, लेकिन अब रबड़ के दाम 120 रुपये किलो तक गिर चुके हैं, जबकि टायर मैन्युफैक्चरिंग के दूसरे इनपुट क्रूड ऑयल, सिंथेटिक रबड़, कार्बन ब्लैक, रबड़ केमिकल, नायलॉन फैब्रिक की कीमतें भी अच्छी-खासी गिरी हैं। फिर भी टायरों के दाम उन्हीं स्तरों पर हैं।
एआईटीडीएफ के कन्वेनर एस. पी. सिंह ने कहा, ‘आयात महंगा होने के चलते डीलर्स को बाहर से टायर लाना महंगा पड़ रहा है, जबकि घरेलू कंपनियां कार्टेल बनाकर दाम बढ़ाती रही हैं। हम इस कार्टेल के खिलाफ कॉम्पिटीशन कमीशन ऑफ इंडिया में लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि कानूनी प्रक्रिया लंबी चलेगी, ऐसे में सरकार को चाहिए कि डीलर्स, ट्रांसपोर्टर्स और आम ग्राहकों को फौरी राहत दे। इसके लिए कस्टम ड्यूटी और एंटी-डंपिंग ड्यूटी में कटौती ही एकमात्र रास्ता है।’
ऑल दिल्ली ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के मेंबर और ऑपरेटर पी. के. जैन ने कहा, ‘पिछली चार तिमाहियों में जहां रबड़ के दाम आधे हो गए हैं, वहीं रुपया डॉलर के मुकाबले 62 के स्तर पर जा पहुंचा है। ऐसे में टायर एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों का मुनाफा बढ़ रहा है जबकि टायर मंगाने वालों पर दोहरी मार पड़ रही है। देश में आज भी 80 पर्सेट ट्रकों में नायलॉन टायर का इस्तेमाल होता है, जिसके आयात पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगी है। सरकार अगर आयात सस्ता करती है तो घरेलू कंपनियों की मोनोपॉली टूटेगी और वे दाम घटाने पर मजबूर होंगी।
स्रोत : इकनॉमिक टाइम्स,  3 फ़रवरी 2015

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