भावना

सेवक के दिल का भाव ही उसे भगवान से मिलाने में सहायक होता है। प्रभु धन दौलत व झूठी शान शौकत से नहीं रीझते। उन्हें तो केवल भक्त का भाव ही प्रिय है। भाव ऊंचा व श्रेष्ठ हो तो प्रभु की कृपा सहज में ही प्राप्त हो जाती है और अगर भाव कपट व स्वार्थपूर्ण हो तो कड़ी तपस्या करने के बावजूद भी प्रभु के अखुट आनन्द के भण्डार का अनुभव नहीं किया जा सकता।
राजा भगीरथ और हिरण्यकशिपु ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी एवं भगवान शिवजी को प्रसन्न किया। लेकिन दोनों के उद्देश्य व भाव में बहुत अंतर था। राजा भगीरथ ने लोक कल्याण के लिए गंगा नदी को धरती पर ले आने का वरदान मांगा। जबकि हिरण्यकशिपु ने स्वार्थवश एकच्छत्र राज्य की मांग की। परिणाम यह हुआ कि वह अहंकार के वशीभूत हो स्वयं को भगवान जानकर सब जगह अपनी ही पूजा करवाने लगा और भगवान विष्णु के उपासकों को घोर यातनाएं देने लगा।
अब विचार किया जाए तो तप तो दोनों ने ही एक दूसरे से बढ़कर किया परन्तु भावना में भिन्नता होने के कारण जहां राजा भगीरथ का सब पर महान उपकार करने के लिए आज भी यश गान किया जाता है वहां हिरण्यकशिपु ने अपयश का भागी बन अपना सर्वनाश कर लिया। भगवान ने अपने पैने नाखूनों द्वारा उसकी छाती को विदीर्ण कर डाला।
भगवान श्री राम जब राजकुमार के वेष में सीता जी के स्वयंवर में मिथिला पधारे तो वहां मौजूद समस्त प्रजा व कई राजाओं ने उनमें भगवान के दर्शन किए। कुछेक राजाओं ने उन्हें साक्षात् काल की न्याईं देखा और कुछेक ने उन्हें साधारण मानव ही जाना। स्वयं परशुराम जी भी क्रोध के वशीभूत हो प्रभु को तब तक न जान सके जब तक उनके भीतर की प्रेम भावना ने उनके क्रोध को भस्मीभूत न कर दिया।
भगवान श्री कृष्ण जी महाराज ने भक्त की भावना को सर्वोपरि जान दुर्योधन के फल व मिष्टान्न को त्यागकर विदुर जी के साग का प्रेम सहित भोग लगाया। दुर्याेधन ने चाहे इस बात पर नाराजगी प्रकट की कि भगवान ने उसका आतिथ्य अस्वीकार करके दासी पुत्र की कुटिया में जाकर भोजन किया परन्तु भगवान ने उसकी तनिक भी परवाह न की बल्कि स्पष्ट शब्दों में भाव का ही जिक्र किया जिसका वर्णन परमसन्त श्री कबीर साहिब जी ने मारु राग में इस प्रकार किया है।
भगवान श्री कृष्ण जी ने शांत व दृढ़ स्वर में कहा के दुर्योधन ! तुम्हारे पास कौन व क्यों आएगा ? मैं तो वहां जाता हूं जहां सच्चा प्रेम भाव हो। मुझे तो बस भाव ही भाता है जो तुम्हारे पास लेशमात्र को भी नहीं है। विदुर जी की मेरे प्रति प्रबल श्रद्धा और भाव देखकर ही मैंने विदुर जी के घर जाने का निश्चय किया। उसके भक्ति भाव ने मेरे दिल को बरबस ही अपनी ओर खींच लिया। दुर्योधन तुम तो हाथी, घोड़े, महल, गाडियों और ऐशो इशरत के सामानों के अहंकार में गलतान होकर मालिक को ही भूल बैठे हो। विदुर जी के पानी में मुझे तुम्हारे दूध से भी बढ़कर अमृत जैसा रस मिला। उसका साग तुम्हारे मिष्टान्न और खीर से भी कहीं अधिक स्वादिष्ट था। उसकी प्रेम और श्रद्धा भरी बातें सुनकर रात कैसे बीत गई, कुछ पता ही नहीं चला। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि भगवान तो आनन्द की मूर्ति हैं और वे जात-पात से परे हैं। उन्हें केवल सच्ची श्रद्धा और भावना से ही रिझाया जा सकता है। प्रभु के प्यारे भक्त जगत में रहते हुए भी जगत से न्यारे रहकर सच्ची निष्ठा व लगन से रुहानी मार्ग की ओर बढ़ते चले जाते हैं।

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