चीन से इम्पोर्ट टायर निकाल रहे हैं देसी टायरों की हवा

नई दिल्ली : टायर बनाने वाली अधिकांश भारतीय कंपनियों के वित्तीय आंकड़ों से पता चलता है कि लगातार तीन साल तक उनकी मुनाफा वृद्धि बेहतर रही है लेकिन एक आंकड़ा ऐसा भी है जिस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।tyre_794612f वित्त वर्ष 2015 में देश में रोजाना औसतन 2,100 से अधिक टायरों की खपत देखी गई जो इससे पिछले साल के मुकाबले 60 फीसदी अधिक है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से करीब 70 फीसदी टायर चीन से आयातित होते हैं जो भारतीय कंपनियों द्वारा कच्चे माल के लिए किए गए भुगतान से भी सस्ते होते हैं। सिएट के प्रबंध निदेशक अनंत गोयनका ने कहा, ‘चीन से जिस कीमत (2 डॉलर प्रति किलोग्राम) पर माल का आयात किया जाता है वह हमारे कच्चे माल की लागत से भी कम है। चीन के विनिर्माताओं को निर्यात पर सब्सिडी मिलती है और वे अपने उत्पादों को डंप करने में समर्थ हैं। चीन में यदि आप कोई टायर खरीदते हैं तो वह निर्यात मूल्य से कहीं अधिक महंगा होगा।’
आयात मुख्य तौर पर ट्रकों एवं बसों के रेडियल (टीबीआर) टायरों का होता है। करीब 23,000 करोड़ रुपये के ट्रक बस टायर कारोबार में इसकी करीब 40 फीसदी हिस्सेदारी है। ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अनुसार आयातित टायरों की खपत वाहनों में दोबारा टायर बदलने की मांग को पूरा करने में होती है। जेके टायर ऐंड इंडस्ट्रीज के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रघुपति सिंघानिया ने कहा, ‘टीबीआर के लिए करीब 25 फीसदी घरेलू मांग की आपूर्ति आयातित टायरों से होती है जो आमतौर पर चीन से आयातित होते हैं। दूसरे शब्दों में बसों एवं ट्रकों में बदले जाने वाले हरेक चार में से एक टायर आयातित होते हैं।’ भारतीय टायर विनिर्माता आयातित टायरों के अनुरूप कीमत रखने में समर्थ नहीं हैं। गोयनका ने कहा, ‘रिप्लेसमेंट बाजार में चीनी टायर भारतीय टायरों के मुकाबले 25 से 30 फीसदी कम कीमत पर बिक रहे हैं। पिछले छह महीनों के दौरान हमने दाम 3 फीसदी घटाए हैं।’
आश्चर्य है कि आयातित टायरों के दबाव और रबर पर अधिक आयात शुल्क की झलक टायर विनिर्माताओं के मुनाफे पर नहीं दिख रहा है। वित्त वर्ष 2015 सिएट का मुनाफा बढ़कर 299 करोड़ रुपये हो गया जो वित्त वर्ष 2013 में 106 करोड़ रुपये रहा था। इसी प्रकार जेके टायर का मुनाफा 105 करोड़ रुपये से बढ़कर 253 करोड़ रुपये हो गया। इस दौरान अपोलो टायर्स का मुनाफा दोगुना से अधिक बढ़कर 645 करोड़ रुपये हो गया। कच्चे माल कीमतों में भारी गिरावट के कारण टायर कंपनियों के मुनाफे पर खास असर नहीं पड़ा। सिंघानिया ने कहा, ‘कच्चे माल की कीमत हमेशा मौजूदा स्तर पर ही बरकरार नहीं रहेगी। आप केवल पिछले दो से तीन साल पर गौर नहीं कर सकते। वित्त वर्ष 2008 और 2012 के बीच उद्योग ने बेहतर मुनाफा नहीं कमाया था।’ उद्योग का कहना है कि सस्ते रबर के कारण भले ही टायर उद्योग का मुनाफा बरकरार रहा लेकिन बढ़ते आयात के कारण राजस्व पर चुनौतियां बरकरार हैं।

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