हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

हमारे देश में भ्रष्टाचार के पनपने के मौके ज्यादा हैं। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सरकारी नियम कमजोर हैं। भारत के संदर्भ में बात करें तो मैं समझता हूं कि हम सदा से किसी न किसी से डर कर ही सही काम करते रहे हैं चाहे राजा से, भगवान से या स्वयं अपने आप से। पिछले कई सालों में आजादी के बाद से हमारा समाज निरंकुश होता चला गया। हर कहीं प्रगति हुई, बस आचरण का पतन हुआ। नैतिक शिक्षा को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल जरूर किया है पर जीवन से नैतिकता गायब होती जा रही है। धर्म निरपेक्षता के चलते धर्म का, दिखावे का सार्वजनिक स्वरूप तो बढ़ा पर धर्म के आचरण का वैयक्तिक चरित्र पराभव का शिकार हुआ। यह बात लोगों के जहन में घर कर गई कि सरकारी मुलाजिमों को खरीदा जा सकता है, कम या अधिक कीमत में। तमाम कोशिशों के बावजूद भी जिस तरह से भ्रष्टाचार दिन दूनी रात चौगुनी गति से फल फूल रहा है, उसे देखते हुये मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि विश्व गुरू भारत को भ्रष्टाचार के पक्ष में खुलकर सामने आ जाना चाहिये। हमें दुनियां को भ्रष्टाचार के लाभ बताने चाहिये। सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार की बुराई करने की दोहरी मानसिकता के साथ अब और जीना ठीक नहीं। जब भ्रष्टाचार के ढेर सारे लाभ हैं तो फिर उन्हें गिने गिनायें और गर्व से यह कहें कि हां, हम भ्रष्टाचारी हैं। हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे।
भ्रष्टाचार के अनंत लाभ हैं। बिना लंबी लाइन में लगे हुये यदि घर बैठे आपका काम हो जाये तो इसमें बुरा क्या है? अब जब ऐसा होगा तो इसके लिये कुछ सुविधा शुल्क भी आप चुकायेंगेे। देने वाले राजी, लेने वाले राजी पर आपकी इस सफलता व योग्यता को देखकर लाइन में लगे बेचारे आम आदमी इस सबको भ्रष्टाचार की संज्ञा दें तो यह उनकी नादानी ही कही जानी चाहिये। स्कूल कालेज में एडमिशन का मसला हो, नौकरी का मामला हो, नियम कानून को पकड़कर बैठो तो बस परीक्षा और इंटरव्यू ही देते रहो। समय, पैसे सबकी बरबादी ही बरबादी होती हैं। बेहतर है सिफारिशी फोन करवायें और पहले ही प्रयास में मनवांछित फल मिलेगा तो आप मूर्ख थोड़े ही हैं जो प्रसाद न चढ़ायेंगे? इस प्रक्रिया को जो भ्रष्टाचार मानते हैं उन्हें नैतिकता का राग अलापने दें। ये समय से सामंजस्य न बैठा पाने वाले असफल लोग हैं। जो कुछ जितने में खरीदा जाना है, वह तो उतने में ही आयेगा। अब यदि सप्लायर सदाशयी व्यवहार के चलते आर्डर करने वाले अधिकारी और बिल पास करने वाले बाबू साहब को कुछ भेंट करे तो समझ से परे है कि यह भ्रष्टाचार कैसे हुआ। शिकायतकर्ता को उसका समाधान मिल जाये, उसके दुख, कष्ट दूर हो जायें और वह खुशी से वर्दी वालों को कुछ दे दे तो भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध मुहिम चलाने वालों के पेट में दर्द होने लगता है। अरे भैया! दान, दक्षिणा, भेंट, बख्शीश, आदान-प्रदान, का महत्व समझिये।
भ्रष्टाचार के लाभ ही लाभ हैं। परस्पर प्रेम बना रहता है, कामों में सुगमता होती है, निश्चिंतता रहती है। सब एक दूसरे की चिंता करते हैं, सद्भाव पनपता है। भ्रष्टाचार एक जीवन शैली है। इसे अपनाना समय की जरूरत है। इस व्यवस्था में आनंद ही आनंद है। एक बार इसका हिस्सा बनकर तो देखिये, आपकी रूकी हुई फाइल दौड़ पड़ेगी। कार्यालयों के व्यर्थ चक्कर लगाने से जो समय बचे, उसे परमार्थ में लगाइये। कुछ भ्रष्टाचार कीजिये। किसी का भला ही करेंगे आप। इस तरह गीता का ज्ञान गांठ बांा लीजिये-साथ क्या लाये थे? साथ क्या ले जायेंगे। अरे कुछ व्यवहार बनाइये। मिल बांटकर खाइये खिलाइये। जीयो और जीने दो। जितनी ईमानदारी भ्रष्टाचार की अलिखित व्यवस्था में है, उतनी स्टैंप पेपर में नोटराइज्ड एग्रीमेंट्स में हो जाये तो अदालतों के चक्कर ही न लगाने पड़े। लोगों को भ्रष्ट व्यवस्था में कभी भी विश्वास, संदेह या गवाही जैसी बकवास चीजों की कोई जरूरत नहीं होती। यदि कभी कोई भ्रष्टाचारी विवशतावश किसी का कोई काम नहीं कर पाता तो सामने वाला उसे सहज ही क्षमा करने का माद्दा रखता है। वह स्वयं भ्रष्टाचार कर अपने नुक्सान को पूरा करने की हिम्मत रखता है। ऐसी उदारहृदय व्यवस्था, मानवीयता की वाहक है। आइये भ्रष्टाचार का खुला समर्थन करें। भ्रष्टाचार अपनायें। भ्रष्ट व्यवस्था के अभिन्न अंग बनें। जब हम सब हमाम में नंगे हैं ही तो शर्म कैसी?

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