सुख व समृद्धि की कामना का पर्व है दीपावली

1दीपावली जैसे पर्व को प्राचीन काल से ही सुख व समृद्धि का प्रतीक माना गया है। इस दिन देवी ‘लक्ष्मी‘ का पूजन होता है। धन संपत्ति तो शुरू से ही मानव समाज की आकांक्षा व आवश्यकता रही है। इस दिन कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो, फिर भी अपनी कमाई का कुछ हिस्सा अवश्य ही ‘दीप‘ जलाने व लक्ष्मी पूजन में खर्च करता है। लक्ष्मी के अनुग्रह का अर्थ आज की भोग विलासिता के जीवन में केवल धन संपत्ति ही माना गया है लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है क्योंकि आज के बदलते परिवेश में ान संपत्ति तो अनैतिक कायो से भी कमाई जा सकती है व इसे खर्च भी किया जा सकता है लेकिन गलत तरीकों से संग्रह किया गया धन ‘लक्ष्मी‘ का रूप नहीं है और इस तरह का धन पारिवारिक जीवन में क्लेश, दु:ख, रोग इत्यादि बढ़ाता है लेकिन इससे जिस प्रकार की ईष्‍​र्या का वातावरण बनता है वह तो और भी दुखदायी है। अत: लक्ष्मी का अनुग्रह किसी के संताप का कारण बने, ऐसा नहीं है पर हां, इससे मानव को सुख शांति की अनुभूति तो होनी ही चाहिए।
अनैतिक उपायों से कमाए धन की चमक-दमक से जीवन में जहां संताप होता है, वहीं उसे दरिद्रता भी माना गया है। महाभारत काल में उसे लक्ष्मी के चुराए वसन भूषण की संज्ञा भी दी है। पौराणिक कथा में उल्लेखित है कि एक बार लक्ष्मी व दरिद्रता ने मानसरोवर कुण्ड में एक साथ स्नान किया। दरिद्रता तो लक्ष्मी से पूर्व स्नान कर निकल आयी और कुटिल मन से वशीभूत हो लक्ष्मी के वसनभूषण पहन कर चली गई, अत: दरिद्रता की झूठी चमक ही उस कृत्य को माना गया है और यही लोगों को भरमाती व माया-मोह में फंसाती है।
पौराणिक कथाओं में बलि के पराभव का जिक्र आता है जिसके बाद से ही असुरों का पतन प्रारम्भ हो गया था। बलि जो अति त्यागी व धर्मपरायण होने के साथ-साथ तपस्वी भी थे, उनके रहते असुरों के पास ान, वैभव और साम्राज्य भी रहा। जब वे धर्म को त्यागने लगे तब लक्ष्मी भी उनसे मुख मोड़कर चली गई। अत: लक्ष्मी भी वहीं रहती है, जहां श्रद्धा, धृति, सहिष्णुता, प्राहि, संतति व क्षमा पाठ होता है। लक्ष्मी के अनुदान, आयु, प्रभाव, वैभव, कीर्ति आदि को उसका तेज माना गया है इसलिए यह स्पष्ट है कि वैभव तथा संपत्ति लक्ष्मी की अनुकम्पा का हिस्सा मात्र है जबकि कल्याण व उल्लास तथा आरोग्य भी लक्ष्मी का ही आहवान है। जहां तक प्रश्न है, दीपावली पर धन संपत्ति के रूप में लक्ष्मी पूजन का तो दिन तो लक्ष्मी के समग्र रूप की आराधना करने का है। मुख्यत: पांच दिन तक चलने वाले इस पर्व का आरम्भ तो ‘धनतेरस‘ से ही हो जाता है। इस दिन गृहणियां बर्तन इत्यादि के अलावा आजकल नयी व आधुनिक वस्तुएं भी खरीदती हैं लेकिन आरम्भ के इस दिन को धनवंतरि पूजन‘ के दिवस में भी मनाया जाता है।
धनवंतरि स्वास्थ्य और बल के आराय देवता विष्णु के तेरहवें अवतार आदि देवताओं के वैद्य माने गये हैं। इनकी आराधना दीपोत्सव से एक दिन पूर्व की जाती है ताकि सभी रोगमुक्त रहें।
अमावस्या के दिन जब पूर्णरात्रि होती है तभी उस दिन दीप जलाकर रोशनी के मायम से लक्ष्मी का अभिषेक किया जाता है। पूजन के बाद ऐसी धारणा व विश्वास व्यक्त किया जाता है कि अब हमारे पास समृद्धि व धन दौलत की कमी न रहेगी। कई लोग लक्ष्मी पूजन के साथ-साथ कुबेर भी पूजते हैं।
दीपावली जैसे महान पर्व को विदेशों में भी मनाया जाता है लेकिन इस महोत्सव की विधि व परम्परा पर अलग अलग धारणाएं हैं लेकिन लक्ष्मी जी का पूजन ही प्रचलन का सबसे प्राचीन तरीका माना गया है। केवल यही ऐसा पर्व है जिसमें समृद्धि की कामना की जाती है।
दीपावली के उस आयात्म दर्शन को आत्मसात् करके ही लक्ष्मी का आशीर्वाद व अनुग्रह प्राप्त होता है लेकिन आजकल लक्ष्मीपूजन के मूल्यों में जिस तरह की गिरावट आ रही है व बाहर दिखावा करने से लोगों में विश्वास की कमी आ रही है, इससे हम ऐसे पुनीत पर्वो के प्रति भी सीमित होते जा रहे हैं।
इसलिए इस महान संस्कृतिनिष्ठ महापर्व की गौरवशाली परम्परा को बनाये रखने के लिए समर्पित भाव से इसके प्रति आस्था रख फिर से निष्ठा बनाये रखने की आवश्यकता है, अन्यथा जब लक्ष्मी देवों व असुरों से भी रूष्ट हो कर चली गयी तो आम आदमी की क्या बिसात है।

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