सदगुरु की तालाश

दिन श्री वचन हुये कि अधिकतर लोग यह कहते हैं कि कोई पूर्ण सन्त मिलते ही नहीं, गुरु करें तो किस को करें? उनसे यह पूछना चाहिये कि क्या तुम पूर्ण शिष्य की श्रेणी पर पहुँच गये हो,जो तुमको पूर्ण गुरु के न मिलने की शिकायत है?यदि तुम्हें पूर्ण गुरु मिल भीजायें, तो तुम उनको किस प्रकार पहचान सकोगे? पूर्ण की पहचान भी तो पूर्ण ही कर सकता है। यदि तुमको वे पूर्णपूरुष ज्ञान-ध्यान आदि की बातें बताना चाहें, तो क्या उनके उच्चकोटि के विचारों और दृष्टकोण को समझने की योग्यता भी तुम में है?उदाहरणार्थ यदि किसी एम.ए.पास प्रोफैसर को दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाने पर नियुक्त कर दिया जाये, तो वे विद्यार्थी उसके व्याख्यान और उच्चविचारों को कब समझ सकते हैं?और यदि प्रोफैसर उनके साथ माथापच्ची करे तो आश्चर्य नहीं कि दो-चार दिन में ही परेशान होकर अपने काम से भी जाता रहे। प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने के लिये मैट्रिक पासअध्यापक की आवश्यकताहै जो सिर पचा-पचा कर उनको पढ़ाया करेऔर एम.ए.पास अध्यापक बी.ए.अथवा एफ.ए.के छात्रों को पढ़ाने का कार्य कुशलता पूर्वक कर सकता है और इन कक्षाओं के छात्र उसके दृष्टिकोण और संकेतों को भली प्रकार समझ सकते हैं।इसी प्रकार अनाधिकारी द्वारा भी पूर्ण पुरुषों की खोज करना व्यर्थ है,क्योंकि यदि पूर्ण पुरुष मिल भी जायें तो वह न उनकी पहचान कर सकेगा और न उनकी शिक्षा पर उसको निश्चय आवेगा।इसलिये जिज्ञासु को चाहिये कि जो भी साधु-सन्त मिलें, उनसे श्रद्धा एवं आस्था सहित अत्यन्त प्रेम और उत्साह से मिले और उनकी सेवा तथा सत्कार करे,जैसा कि कथन है:-
तुलसी या संसार में, सबसे मिलिये धाय।।
न जाने किस भेस में नारायण मिल जायें।।
फरमाते हैं कि ऐ जिज्ञासु!यदि तुझे पूर्ण पुरुषों से मिलने की अभिलाषा है तो तू प्रत्येक साधू-सन्त सेश्रद्धासहित मिलऔर उनकी पवित्र संगति से लाभ उठा।शनै: शनै: जब तुझमें योग्यता उत्पन्न हो जायेगी, तब एक दिन तुझे पूर्ण महापुरुष जो कुल मालिक का साकार रूप होते हैं,अवश्यमेव मिल जायेंगे। जिज्ञासु को चाहिये कि प्रत्येक साधू-सन्त से मिले और उनका सतसंग करके अपने को अधिकारी बनाए और उनकी बताई हुई युक्ति पर श्रद्धा और विश्वास के साथ आचरण करे तथा उसकी कमाई करे।इस प्रकारआचरण करते रहने से जब वह अधिकारी बन जायेगा तो उसे एक दिन पूर्ण सन्त सदगुरु भी अवश्य मिल जायेंगे।
दाना डालना परिन्दों को शुरू कर दे। इक दिनआयेगा हंस जरूर बन्दे।।
कहते हैं कि एक लड़का अपने पिता के साथ मेला देखने गया। मेले में प्राय: भीड़-भाड़ तो हुआ ही करती है, संयोग से वह लड़का उस भीड़ में अपने पिता से अलग हो गयाऔर लगाअपने पिता को ढूँढने।चूँकि उसके पिता ने सिर पर पीला साफा बाँध रखा था, इसलिये जो व्यक्ति भी पीला साफा बाँधे हुए दिखाई देता,उसी के पास दौड़ कर जाता,परन्तु पास जा कर जब उसे देखता तो अपने पिता को न पाकर उदास हो जाता। इतने पर भी उसने अपना प्रयास न छोड़ा और जिसके सिर पर पीला साफा देखता,उसी से दौड़ कर मिलता।अन्त: प्रयासऔर खोज करते-करते उसे अपना पिता भी मिल गया।इसी प्रकार साधू-महात्माओं से भी मिलते रहना चाहिये और उनसे जितना भी सत्संग का लाभ प्राप्त हो सके,प्राप्त कर लेना चाहिये। होते-होते एक दिन मनोकामना पूर्ण होगी और पूर्ण महापुरुषों के दर्शन भी हो जायेंगे।
मालिक के दर्शनऔर उसकी प्राप्ति की आशा को लेकर मैं स्थान स्थान पर फिरता रहा, परन्तु मेरी पिपासा शान्त न हुई श्री गुरुनानकदेव जी फरमाते हैं कि जब मुझे पूर्ण पुरुष सदगुरु देव जी मिले, तब मेरी तृषा शान्त हुई और मुझे अपने घट में ही गुरु-कुपा से मालिक का दर्शन प्राप्त हुआ।

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