सत्यमेव जयते

एक दिन ब्राह्मण ने मार्ग पर चलते हुए एक हीरा पड़ा पाया, जिसकी कीमत एक लाख रुपए थी। वह साधारण रूप से ही हीरे को लिए हुए जा रहा था। कि आगे की ओर से एक जौहरी जगह-जगह भूमि को देखता हुआ आ रहा था। वह विशेष व्याकुल था। ब्राह्मण ने उसे देखकर पूछा, ‘‘जौहरी भाई, तू व्याकुल क्यों है ? देख, एक हीरा हमने पाया है। तेरा हो तो तू ले ले।’’ यह कहकर उसने हीरा जौहरी को दे दिया। अब जौहरी कहने लगा, ‘‘मेरे तो दो हीरे थे। एक तो तूने दे दिया। अब दूसरा भी दे दे, तब मैं तुझे छोड़ूँगा।’’ दोनों में काफी देर तक कहा सुनी हुई। आखिर जौहरी ने ब्राह्मण को पुलिस के हवाले कर अपना मुकदमा अदालत में दे दिया।
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वहाँ हाकिम ने उस ब्राह्मण से पूछा, ‘‘कहो भाई, क्या मामला है ?’’ ब्राह्मण ने कहा, ‘‘मैं मार्ग में साधारण रूप से जा रहा था कि मुझे एक हीरा पड़ा, मिला। तभी सामने से यह जौहरी कुछ ढूँढ़ता हुआ व्याकुल सा चला आ रहा था। मैंने इससे पूछा, क्या है ? तब इसने कहा कि मेरा एक हीरा खो गया है। मैंने वह हीरा इसे देकर कहा कि देखो, यह एक हीरा मैंने पाया है। यदि तुम्हारा हो तो ले लो। तब इसने हीरा ले लिया।

और अब यह कहता है कि मेरे तो दो हीरे थे।’’ अब हाकिम ने जौहरी से पूछा। तब जौहरी बोला, ‘‘मेरे तो दो हीरे थे, जो मार्ग में गिर पड़े थे। उनमें से एक तो इसने दे दिया, पर एक नहीं देता है।’’ हाकिम ने समझाया, ‘‘यह ब्राह्मण यदि अपने ईमान का पक्का न होता, तो इतना दीन होते हुए एक भी क्यों देता ?’’ किंतु जौहरी संतुष्ट नहीं हुआ, अतः हाकिम ने यह फैसला किया, ‘यह हीरा ब्राह्मण को दे दिया जाए। यह जौहरी का नहीं, क्यों इसके दो हीरे एक साथ गिरे थे, सो इसके हीरे कहीं और होंगे-’’ अब तो जौहरी घबरा उठा। वह घिघियाकर बोला, ‘‘सरकार तो मुझे एक ही हीरा दिला दिया जाए।’’ तब हाकिम ने कहा, ‘‘अब वह तुमको नहीं मिल सकता, क्योंकि मेरा फैसला तो हो चुका।’’

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