सड़कों से सिमटता समाजवाद

हालांकि कानून सड़क चलने का पहला अधिकार पैदल चलने वालों का मानता है पर यह बात कानून की मोटी किताब में गुम है। सड़क पर चलने का पहला अधिकार बड़े और महंगे वाहनों वालों ने छीन लिया है। वाहनों की बढ़ती भीड़ से सड़कें तो चौड़ी होती हैं पर पैदल और साइकिल से चलने वाले लिए हाशिए नहीं रहे। छोटे-बड़े वाहनों की भीड़ में पैदल चलने वालों की कोई जगह नहीं है।
तेज रफ्तार वाहन राहगीरों और दुपहिया चालकों के लिए शार्क की तरह हैं। ऐसे अधिकतर वाहन चालक दोपहिये चालक और राहगीरों को कीड़े-मकौड़े समझते हैं। तभी तो देश की सड़कों पर हर साल 10 हजार लोग सड़क दुर्घटना में अकाल काल के गाल में समा जाते हैं। अनुमान है कि औसतन हर छह मिनट में देश में कोई न कोई व्यक्ति सड़क दुर्घटना में दम तोड़ता है। इस मामले में विश्व स्तर पर भारत का स्थान दूसरा है। चीन पहले स्थान पर है। संभावना है कि भारत जल्द ही चीन के आगे निकल जाए।
लापरवाही से वाहन चलाने की फितरत लाखों लोगों में है। अनुशासन में वाहन चलाने का प्रशिक्षण लेने वाले बहुत कम होते हैं। बहुसंख्यक वाहन चालक अपने जान-पहचान या घर-परिवार के किसी सदस्य से ही सीखते हैंं। ऐसे लोग साधारणत: वाहन चलाना तो सीख लेते हैं पर सड़कों पर उत्पन्न होने वाली ट्रैफिक की विभिन्न स्थितियों में वाहन को नियंत्राण करने का उन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं होता।
देश का शायद ही कोई जिला हो जहां वाहन चलाने का लाइसेंस खूब-जांच परख कर दिया जाता हो। यह कोई झूठ नहीं है कि महज कुछ औपचारिकताएं पूरी करने या भ्रष्टाचार के दम पर वाहन चलाने का लाइसेंस आसानी से जारी हो जाता है।
सड़कों पर मरने वाले लोगों की संख्या के प्रति सरकार कभी बहुत ज्यादा गंभीर नहीं दिखी। एड्स से ग्रस्त व्यक्ति भी हर साल इतनी संख्या में नहीं मरते है पर इसके जागरूकता अभियान पर हजारों करोड़ हर साल फुंक जाते हैं। सड़क दुर्घटना के आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए के तहत मुकदमा दर्ज होता है। दोषी सिद्ध होने पर तीन साल से ज्यादा की सजा हो सकती है पर लापरवाही से वाहन चलाकर किसी की जान लेने वाले जल्दी पकड़ में कहां आते हैं। जो पकड़े जाते हैं, इसलिए बच जाते हैं क्योंकि वे शराब के नशे में वाहन चला रहे थे।
जब तक वाहन चलाने का प्रशिक्षण प्रमाणिक संस्थाओं से अनिवार्य नहीं कराया जाएगा, चालक किसी न किसी तरह से ट्रैफिक की बारीकियों से अनजान रहेंगे। चालकों में संयम के संस्कार उपजाने की भी जरूरत है हालांकि अ​िाकतर दुर्घटनाओं में मरने वाले दूसरे की लापरवाही के शिकार होते हैं। जब तक अभियान चलाकर लोगों के दिलों दिमाग में दुर्घटना के दर्दनाक सच का अहसास नहीं कराया जाएगा, शायद यह सिलसिला नहीं थमे।

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