संत कृपा

एक दिन भगवान श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर जी को एक गांव में जाकर उस गांव के सबसे महापापी व दुष्ट व्यक्ति को अपने पास लाने का आदेश दिया। युधिष्ठिर जी ने कहा कि भगवन ! मुझे कैसे पता चलेगा कि सबसे पापी व्यक्ति कौन है ? भगवान ने कहा कि गांव में पहुंचते ही जिस प्रथम व्यक्ति से तुम्हारी भेंट हो उसे ही महापापी समझना और उसके बारे में भले ही गांव वालों से भी जानकारी ले लेना।
आज्ञा पाकर युधिष्ठिर जी उस गांव की ओर बढ़े और जिस प्रथम व्यक्ति से उनकी भेंट हुई उसके हाथों में माला थी और मस्तक पर बड़ा सा तिलक लगा हुआ था। उन्होनंे वहां के लोगों से उसके बारे में पूछा तो उन सबने उसके बारे में यही कहा कि यह ढोंगी और पाखंडी है। ऊपर से वेशभूषा साधुओं वाली डाल रखी है लेकिन यह महाकपटी सबसे धोखा करने वाला महापापी है। युधिष्ठिर जी उसे साथ लेकर भगवान के पास आए। भगवान के दर्शन पाते ही उसके उसके संस्कारों ने जबरदस्त पलटा खाया और उसके अन्तर्मन की समस्त मैल धुल गई। उसे प्रेम का रंग चढ़ गया। प्रेमविभोर हो अश्रु बहाता हुआ भगवान के चरणों में गिरकर वह क्षमायाचना करने लगा। भगवान ने उसे पश्चात्ताप करता देख उस पर अपनी कृपादृष्टि डालकर सच्चे नाम की दात दे उसे वापस गांव भेज दिया।

Image result for krishnaअगले दिन भगवान श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर जी को पुनः उस गांव में जाकर किसी पूर्ण महात्मा जी को लाने के लिए भेजा। युधिष्ठिर जी के पूछने पर उन्होंने कहा कि गांव में प्रवेश करते ही जिस प्रथम व्यक्ति से आपकी भेंट हो, उसे पूर्ण साधु जान हमारे पास लेकर आना।युधिष्ठिर जी जब गांव में पहुंचे तो उनके आश्चर्य की कोई सीमा न रही। क्योंकि उनकी भेंट उसी व्यक्ति से हुई जो सबसे बड़ा पापी था। वे हैरत में पड़ गए। लोगों से पूछा तो उन्होंने कहा कि कल से इसके स्वभाव में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ है। यह बदनीयत से नेकनीयत इन्सान बन गया है। इसके हृदय में अवगुणों की जगह सद्गुणों का वास हो गया है और इसका मन पूर्णतया पाक पवित्र हो गया है। अब यह पापी से धर्मात्मा बन गया है। युधिष्ठिर जी जान गये कि यह सब भगवान की अन्तत कृपा का ही फल है जो उन्होंने इस दुराचारी को एक महान सन्त बना दिया है। प्रभु की शरण में आ जाने से व उनकी असीम कृपा द्वारा जीव का कल्याण हो जाना निश्चित है।
दूसरे विकारों वाले मनुष्य का पार हो जाना आसान है पर निंदक का पार होना अत्याधिक कठिन है। सुखमनी साहिब में महापुरुष फरमाते हैं कि संत कृपा से निंदक भी सहजे ही भव से पार हो जाता है।

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