संतोष धन

एक घर में दो भाई रहते थे। उनमें से एक तो गुरुमुख था और दूसरा मनमुख था। गुरुमुख भाई संतो से अथाह प्रेम प्यार रखने वाला और परम संतोषी था जबकि मनमुख भाई को संतों का दर्शन बिल्कुल न सुहाता था। एक बार गुरुमुख भाई मनमुख भाई की अनुपस्थिति में एक संत जी को बड़ी श्रद्धा प्रेम से अपने घर ले आया। वह जैसे ही उनके लिए भोजन आदि की व्यवस्था करने गया कि पीछे से उसका मनमुख भाई भी किसी कार्यवश घर आ गया। महात्मा जी को अपने घर में बैठा देखकर वह क्रोध से आग बबूला हो गया और उन्हें अपशब्द बोलकर घर से निकल जाने को कहने लगा।
महात्मा जी थे ही शांत रुप, सो एकदम उठकर चलने लगे। अभी दरवाजे से बाहर निकले ही थे कि गुरुमुख भाई सामने आ गया। उसने देखा कि महात्मा जी जा रहे हैं तो अपने द्वारा हुए विलम्ब के कारण चरणों में गिरकर क्षमायाचना करने लगा और विनती करके पुनः उन्हें अंदर ले गया। उनके अंदर आकर बैठने की देर थी कि मनमुख भाई भी वहां आ पहुंचा और उन्हें वापस आया देख बुरा भला कहने लगा। यही नहीं, क्रोध के आवेश में आकर उसने महात्मा जी को हाथ से पकड़कर बाहर निकाल दिया।
महात्मा जी तो सब्र करके बाहर चले गए परन्तु उसी वक्त वहां आकाशवाणी हुई कि जिस शख्स ने आपका इतना अपमान किया है, आप कहें तो मैं अभी इसी क्षण उसकी जीवन लीला समाप्त कर दूं अथवा उसका सबकाम धंधा चैपट कर दूं।। महात्मा जी ने उसी शांत स्वभाव से कहा कि प्रभु ! मुझे वहां ले जाने वाले भी आप थे और निकालने वाले भी आप ही थे। मैं तो हर प्राणी में आपकी ही छबि देखता हूं। फिर भी आप यदि मुझ पर दयाल हुए हैं और मुझसे कुछ कहलवाना चाहते हैं तो मेरी यही प्रार्थना है कि उसे सुमति व संतोष प्रदान करें।
मुझे तो उसी के संयोग से ही आपकी यह कृपा नसीब हुई है। फिर जिसके द्वारा आपकी कृपादृष्टि मिल जाए उसके लिए तो मुझे शुक्रगुजार होना चाहिए। वह तो मेरा परम मित्र हुआ क्योंकि उसने मुझे दुःख की बजाय अपार सुख प्रदान किया है जिसका मैं ऋण नहीं चुका सकता। प्रभु ने उसकी ऐसी उच्च अवस्था देखकर उसे अपने साक्षात् दर्शन देकर कृतार्थ किया।
महात्मा जी भगवान के चरणों में नतमस्तक हो प्रेमविहाल हो गये। कहने लगे कि प्रभु ! यह सब आपकी ही बढ़ाई है। अन्यथा यह गुण तो पशुओं में भी है कि उन्हें प्यार करो तो वे चले आते हैं अगर लाठी दिखाओ तो भाग जाते हैं। महात्मा जी ने प्रभु को प्रसन्न जान उनसे भक्ति का अमर दान देने की याचना की। प्रभु उन्हें आर्शीर्वाद प्रदान कर अन्तर्धान हो गए।
उधर दूसरी ओर प्रभु की प्रेरणा से मनमुख भाई का अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। वह जार जार रोता हुआ महात्मा जी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा और उन्हें घर पधारने के लिए बार-बार विनती करने लगा। उन्हें प्रेम और आदर सहित अपने घर ले जाकर जलपान आदि करवाया। महात्मा जी ने फरमाया कि हृदय में नम्रता व संतोष धारण करने से ही जीव को सुख शान्ति की प्राप्ति हो सकती है। जिसके मन में संतोष आ जाता है वह सभी विकारों से मुक्त हो जाता है।
महात्मा जी के वचन श्रवण कर उसने भी सुखी जीवन व्यतीत करने का मार्ग पूछा। महात्मा जी ने उसकी प्रेम व नम्रता देखकर उसे नाम का उपदेश दिया और कहा कि नाम का निरन्तर अभ्यास करने से तुम जीवन को सुखरुप बना सकते हो। महात्मा जी की आज्ञा शिरोधार्य कर उसने शब्द की कमाई करके मन को नियन्त्रित कर लिया और दुनियावी मान-सम्मान को मिथ्या सब्र में रहकर जीवन व्यतीत करने लगा।
एक बार वह अपने पुत्र के साथ कहीं जा रहा था कि मार्ग में एक व्यक्ति उसे खूब गालियां निकालने लग गया। उसका पुत्र कहने लगा कि पिता जी ! वह आदमी आपको गालियां निकाल रहा है और आप चुपचाप चले जा रहे हैं। उसने अपने पुत्र को समझाते हुए कहा कि बाजार में जिसके पास जो वस्तु होती है वह उसी का सौदा करता है। लेकिन वह चीज उसको मिलती है जो उसका मूल्य देता है। इस आदमी के पास केवल गालियां ही हैं और जब हमने जवाब देकर इसका कोई मूल्य ही नहीं दिया तो ये गालियां हमारी कैसे हुईं ? उसकी वस्तु उसके पास रही और हमारा आनन्द व सन्तोष हमारे पास रहा।
यह सूझबूझ और विवेक सत्पुरुषों की शरण में आने से ही मिलता है। नहीं तो जीव प्रतिशोध की भावना रखकर उस अज्ञात ज्वाला में न जाने कब तक जलता रहता। यह तो सद्गुरु की अनन्त कृपा है कि उन्होंने मन से सारे द्वन्द्वों को मिटाकर सन्तोष धन प्राप्त कर हृदय में शीतलता भर दी है।

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