वाइट गुड्स कंपनियों पर GST मुनाफाखोरी का शक

Related image मुंबई  : गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स का फायदा उपभोक्ताओं को नहीं देने के मामले में रेस्टोरेंट्स के अलावा एफएमसीजी और फार्मा कंपनियों पर जुर्माना लगाने के बाद टैक्स अधिकारियों की नजर कंज्यूमर ड्यूरेबल्स यानी वाइट गुड्स कंपनियों की ओर घूमी है।

एंटी-प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी यह जांच कर रही है कि वॉशिंग मशीनों, टीवी या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक प्रॉडक्ट्स पर जीएसटी रेट घटाए जाने के बाद कंपनियों ने मुनाफाखोरी की थी या नहीं। मामले से वाकिफ दो लोगों ने बताया कि अधिकतर बड़ी कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनियों पर टैक्स अधिकारियों की नजर है, लेकिन हाई-एंड वॉशिंग मशीनें और कई अन्य प्रॉडक्ट्स बनाने वाली कोलकाता की आईएफबी अप्लायंसेज इस मामले में नोटिस पाने वाली पहली कंपनी बन गई है।

बीएसई पर लिस्टेड वाइट गुड्स कंपनी आईएफबी से कुछ महीने पहले उसकी वॉशिंग मशीनों की कॉस्ट और सेलिंग प्राइस की जानकारी मांगी गई थी। एक व्यक्ति ने ईटी को बताया, ‘कंपनी ने पहले लेटर का जवाब नहीं दिया, तो नेशनल एंटी-प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी ने दूसरा लेटर भेजा था। कंपनी से कहा गया था कि वह जीएसटी से पहले और उसके लागू होने के बाद अपने प्रॉडक्ट्स की कॉस्ट, सेलिंग प्राइस की जानकारी दे।’ आईएफबी को इस संबंध में भेजी गई ईमेल का जवाब नहीं मिला।

सूत्र ने बताया कि आईएफबी पर आने वाले हफ्तों में जुर्माना लगाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि दूसरी कंपनियों की भी जांच की जा रही है और आने वाले हफ्तों में उन्हें लेटर जारी किए जाएंगे।

इंडस्ट्री पर नजर रखने वालों का कहना है कि एंटी-प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी का फोकस उन वस्तुओं पर दिख रहा है, जिनसे इंफ्लेशन पर असर पड़ सकता है। जीएसटी लागू करने का कई देशों में एक असर यह रहा है कि इससे इंफ्लेशन बढ़ गई।

खेतान एंड कंपनी के पार्टनर अभिषेक ए रस्तोगी ने कहा, ‘एंटी-प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी हर उस सेक्टर की जांच कर रही है, जिससे इंफ्लेशन पर सीधा असर पड़ता है। यही वजह है कि वाइट गुड्स कंपनियों की अभी जांच की जा रही है। हालांकि यह सवाल बना हुआ है कि कोई भी तरीका तय नहीं किए जाने के कारण कंपनियों के लिए मुनाफाखोरी और जीएसटी रेट में कमी के फायदा की गणना करना बहुत मुश्किल है।’

सूत्रों ने कहा कि अधिकतर कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनियों के लिए जीएसटी के पहले और बाद के प्राइस कट्स की गणना करना भी बहुत मुश्किल है। इसकी मुख्य वजह यह है कि अधिकतर कंपनियों ने विभिन्न रिटेल आउटलेट्स से अलग-अलग करार किए हैं।

एक्सपर्ट्स ने कहा कि अधिकतर वाइट गुड्स कंपनियों के लिए जीएसटी प्राइस कट की गणना करना एक चुनौती बन गया है। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर एम एस मणि ने कहा, ‘कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर के तहत विभिन्न चैनल पार्टनर्स के बीच कई तरह के प्रमोशन और डिस्काउंट चलते रहते हैं। इससे जीएसटी रेट में बदलाव या इनपुट टैक्स क्रेडिट में बदलवा के साथ प्राइस में बदलाव का संबंध तय करना बहुत ही चुनौती वाला काम है।’

एक वाइट गुड्स कंपनी के करीबी एक शख्स ने कहा, ‘लिहाजा सैमसंग जैसी कंपनी ने हो सकता है कि विजय सेल्स के साथ डिस्काउंट का एक सेट रखा हो और क्रोमा या एमेजॉन के साथ दूसरा। सैमसंग इन रिटेलरों को विभिन्न प्रॉडक्ट्स पर अलग-अलग डिस्काउंट्स देगी।’

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