प्रवचन

ससार में जितने भी जीव हैं उनके उतने ही विचार हैं। सच्ची बात तो यह है कि एक एक जीव के अनेक अनेक विचार हैं और अपने विचारों के अनुसार ही जीव मोक्ष और बन्धन को प्राप्त होता है। मोक्ष तो तब मिलेगा जब सब विचार समाप्त हो जाएंगे। इसीलिये सद्ग्रन्थ कहते हैं कि संचित विचार ही जन्म और मृत्यु का बार बार कारण बनते हैं।
विचार भी अनेक प्रकार के होते हैं परन्तु इन विचारों में भी गुप्त रहस्य हैें। जो विचार मोह माया से युक्त होते हैं, वही विचार आवागमन के हेतु होते हैं परन्तु जो विचार निष्काम कर्म में लगे हुए हों वह मुक्ति का कारण बनते हैं। विचार तो हर समय हर घड़ी कोई न कोई तो आते ही रहते हैं; यहां तक कि सोये हुये भी विचारों के स्वप्न बनते हैं। यह विचार क्या है? किसी वस्तु की इच्छा करना ही विचारों का स्वरूप है। जब किसी को पाने की चाह मन में उत्पन्न हुई तो मनुष्य उन्हीं विचारों में लीन हो गया। यही विचार ही संकल्पों-विकल्पों का रूप बन गए और यही संकल्प विकल्प ही अन्त समय अन्यान्य योनियों का कारण बन जाते हैं। मृत्यु समय जैसा ख्याल दिल में आया वही योनि उसे प्राप्त करनी पड़ी। परमसन्त श्री कबीर साहब जी फरमाते हैं –
।। दोहा।।
बहुत पसाा जनि करे, कर थोरे की आस।
बहुत पसारा जिन किया, तेई गये निरास।।
अर्थात् जितना भी कुटुम्ब तथा शाररिक सम्बन्धी वस्तुओं से नेह बढ़ाते जाओ उतनी ही आशा बढ़ती जाती है। इसीलिए इस पसारे को न बढ़ाते हुए कम करना चाहिये। जिन्होंने भी इस दुनियावी वस्तुों से लगाव बढ़ाया उन्हें अन्त समय यहां से निराश होकर पश्चाताप करते हुए जाना पड़ा।
प्राचीनकाल में सती तथा प्रचलित थी। एक सती नारी पति की मृत्यु पर उसकी चिता में ही जलकर भस्म हो जाती थी। इस प्रथा को अध्यात्म-पक्षा से लिया जाए तो इसका तात्पर्य यह है कि सुरति और शब्द का पत्नि तथा पति का नाता है। सुरति रूपी सती अपने शब्द रूपी पति में एकाकार हो जाने के लिए अपने को तृष्णा, वासना, काम, क्रोधादि के संकल्प-विकल्पों की चिता बना कर उसमें बैठ जाए। अपने को योगाग्नि में दग्ध कर के शब्द रूपी पति से जा मिले। वास्तव में यही सती प्रथा का भाव है कि अन्तिम मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। सभी संकल्प विकल्प शब्द में समाकर एक रूप बन जाएं जिससे आवागमन के दु:खों से छुटकारा मिले। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं-
।। दोहा।।
आसा एक जो नाम की, दूजी आस निवार।
दूजी आसा मारसी, ज्यों चैपड़ की सार।।
केवल नाम को जपने की आशा दिल में रखकर दूसरी आशाओं का अन्त करना है। यदि अन्य आशाएं दिल में घर कर गईं तो चैपड़ के खेल की भांति कभी न समाप्त होने वाला चक्र आरम्भ हो जाएगा। इस चक्र से निकलना एक असाध्य प्रश्न बन जाएगा।
प्रभु का नाम सुमिरण करने से प्रभु की प्राप्ति होती है। जब मालिक की प्राप्ति हो गई तो मुक्ति स्वयमेव हो गई तो फिर मोक्ष की प्राप्ति में साधन शेष न रहा।
प्रवचन
सगुण धरती और निर्गुण पानी है। पानी धरती के बिना नहीं रह सकता और न ही वह मिल सकता है। इस प्रकार सगुण का ध्यान करना मानो कुआ खोदकर पानी प्राप्त करना है। सगुण पूजा से ही सब कुछ प्राप्त होगा। यदि साधक निर्गुण उपासना करे और सगुण भक्ति को न अपनाए तो उसे न तो सगुण साकार ईश्वर के दर्शन होंगे और न ही वह निर्गुण तत्व को प्राप्त कर सकेगा। श्री रामचरितमानस में लिखा है –
।। चौपाई ।।
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भांति कोउ करै उपाई।।
तथा मोक्ष सुख सुन खगराई। रहि न सकै हरि भक्ति विहाई।।
सगुण पूजा ही मालिक की प्राप्ति का सरल साधन है। ऐसे समझो धरती सगुण है जिसका रंग रूप ठोस पदार्थ के रूप में देख सकते हैं तथा आकाश निर्गुण-निराकार तत्व है जिसका कोई रंग रूप दिखाई नहीं देता। अब यदि आकाश को कोई अपनाए अथवा उस पर मकान अथवा स्थान बनाना चाहे तो क्या बना सकेगा? कदापि नहीं। बिना पृथ्वी के आकाश में कुछ भी नहीं बन सकता। इसके साथ ही यदि हम धरती के कुछ टुकड़े को खरीद कर उस पर भवन निर्माण करते जायें, वह भवन चाहे दस मंजिल का बनाएं अथवा पच्चास का-अब तो धरती के साथ आकाश भी अपना बन गया। इसी प्रकार ही सगुण की पूजा से निर्गुण तत्व को प्राप्त किया जा सकता है। बिना सगुण पूजा के आत्म दर्शन नहीं हो पाएंगे। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं-
।। दोहा ।।
घट घट मेरा साईंयां, सूना घट नहिं कोय।
बलिहारी वा घट के, जा घट परगट हाये।।
अर्थ – प्रभु तोहर एक प्राणी के हृदय में विराजमान हैं। कोई भी हृदय ऐसा नहीं जहां पर प्रभु विराजमान न हों परन्तु वही हृदय धन्य है जहां पर प्रभु प्रकट हुये हैं अर्थात् जिसने मालिक का दीदार घट में कर लिया है। जैसे पानी तो पृथ्वी के नीचे हर जगह मौजूद है परन्तु प्यास तो कुंए अथवा बावली के स्थान से ही मिट सकती है जहां पर पानी प्रकट हो चुका है। इसी प्रकार ही सन्त सत्पुरुषों ने तो आत्म-साक्षात्कार कर लिया होता है, उन्हीं की शरण में जाने से अथवा उनकी उपासना से ही निराकार स्वरूप के दर्शन हो सकते हैं।

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