पैसा वसूल है ये बजट

इस बात में कोई दोराय नही कि बजट में सरकार ने पहले दो फिर लो की नीति अपनाई है क्योंकि यह आम आदमी को राहत देने से ज्यादा इकनोमिक रिफार्म की दिशा में बढ़ाया गया कदम लग रहा है। सरकार ने बड़ी मात्रा में निवेश को बढ़ावा देने की पूरी व्यवस्था इस बजट के जरिए की है बात चाहे विदेशी निवेश की हो या घरेलू निवेश की, जिसमें दो बिन्दु मुख्य हैं विदेशी निवेश के लिए नियमों को आसान किया है और कल्याणकारी योजनाओं को इनवेस्टमेंट के जरिये लागू किया है। विदेशी निवेश को आसान बनाने के लिय सरकार ने जनरल एंटी अवोइडेन्स रूल्स गार को दो साल के लिए टाल दिया है।
कॉर्पोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से 25 प्रतिशत कर दी है। वही दूसरी ओर सर्विस टैक्स में 12.36 से 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है और 2 प्रतिशत स्वच्छ भारत से लगाकर आम आदमी से भी पैसा उगाही का प्रबंध किया है। चूंकि ये पूरा बजट भारत में निवेश करने थीम पर आधारित है इसलिए अच्छे दिनों की आस फिलहाल दूर की गोटी लगती है। इसलिए ये स्पष्ट हो गया है कि आने वाले कुछ समय में मंहगाई का बढ़ना तय है। सरकार को पैसा चाहिए इसलिए इस सरकार ने आने के बाद जितनी भी कल्याणकारी योजनाएं चलाई है वो सारी निवेश करने पर आधारित हैं बात जनधन योजना की करे तोे उससे भी सरकार को काफी पैसा मिला है और किसान विकास पत्र जो कि कांग्रेस ने बंद किया था वह भी सरकार ने चालू कर दिया है उससे भी पैसा आएगा। अब इस आम बजट में सरकार ने पैंशन योजना और हेल्थ इंश्योरेंस में इन्वेस्ट करने को बढ़ावा दिया है जिससे कि सरकार के पास रेवेन्यू ही आएगा। चुनावों में इस सरकार का सबसे बड़ा मुद्दा ब्लैक मनी लाने का था उसके लिए सरकार ने विधेयक लाने की बात कही है जिसमें कि कड़ी सजा का प्रावधान होगा लेकिन निवेश के नियमों को जिसमें गार अहम है को आसान बनाकर मनी लॉड्रिग का रास्ता खुला छोडा है। ऐसे खाता धारक जिसके खाते में काला धन हो भारत में किसी विदेशी नागरिक से भारत में निवेश के जरिये अपना पैसा वापस ला सकता है। इसके अतिरिक्त मिनिमम अल्टरनेट टैक्स मेट को भी विदेशी निवेशकों के लिए हटा दिया गया है।
दुनिया में भारत के अस्पतालों की स्थिति यहाँ की जनसंख्या के लिहाज से निराशाजनक है लेकिन सरकार के इस बजट में आम आदमी के स्वास्थ्य की ज्यादा चिंता नही है सर्विस टैक्स बढने से दवाईयां और अस्पतालों में इलाज मंहगा होगा। कुछ एम्स अस्पतालों की घोषणा जरूर की गई है लेकिन इसमें वक्त लगेगा। एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर के देश अपनी जीडीपी का 10 प्रतिशत स्वास्थ्य में खर्च करते हैं और डब्ल्यू.एच.ओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी भी देश को अपनी जीडीपी का कम से कम 3 प्रतिशत स्वास्थ्य में खर्च करना चाहिए और भारत अभी भी मात्रा एक प्रतिशत ही खर्च कर रहा है। बजट में देश भर में पड़े तकरीबन 20,000 टन गोल्ड को इस्तेमाल में लाने का आईडिया अच्छा है इससे सबसे बड़ा लाभ गोल्ड के आयात और तस्करी रोकने में हो सकता क्योंकि भारत विदेशों से हर साल 800 से 1000 टन गोल्ड़ आयात करता है जिसमें कमी लाने के लिए कस्टम ड्यूटी को 10 प्रतिशत कर दी गयी थी। लेकिन सरकार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा गोल्ड़ अनऑफीशियल रास्ते से यानि तस्करी से आ रहा है। 2014 की बात करें तो 200 टन गोल्ड़ तस्करी से आया।
लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों के पास पड़े सोने को घरों से निकालने का होगा, क्या ब्याज के लालच में लोग अपने घरों में पड़ा गोल्ड जमा करेंगे? अर्थशास्त्री इस बजट को एक नई अर्थव्यवस्था की नीव के रूप में भी देख रहे हैं क्योंकि मेक इन इंडिया के जरिये भारत के दरवाजे विदेशी बाजार के लिए खोल दिए गए हैं। लेकिन इस तरह की अर्थव्यवस्था को खडा करने लिए भूमि अधिग्रहण जैसे कानून एक सामाजिक त्रासदी भी पैदा कर सकती है। बजट के बाद अरूण जेटली ने कहा कि उद्योगों से कमाएंगे तभी गरीबों के लिए कल्याणकारी स्कीम चलाऐंगे। जिसे कि एक संकेत भी मान सकते हैं कि आने वाले दिनों में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का बोलबाला होगा। सीधे तौर पर कहें तो गरीब तबके को प्रोडक्टिव वे में लाने यानि उनके हाथों काम न देकर उस तबके को कल्याणकारी स्कीम के आसरे छोड़ा जाये।

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