पेड़ लगाना, नदियां साफ करना देश के नेताओं का पैसा कमाने का धंधा बन चुका हैं ?

Image result for save tree80 के दशक से सुनते आ रहे हैं कि गंगा-यमुना नदी साफ कि जाएगी और तब से अरबों-खरबों का बजट लग चुका है। मगर आज तक न गंगा साफ हुई न यमुना साफ हुई पैसा कहां गया? इसी तरह अब पेड़ लगाने के नाम पर दिल्ली सरकार, भारत सरकार अरबों-खरबों के प्रोजेक्ट पास कर चुकी है।
पिछले कई सालों से सुन रहें हैं कि 10 लाख पेड़ लगा दिए 20 लाख पेड़ लगा दिए मगर देखा जाए पहले के पेड़ लगाए मेन्टेन नहीं किये जा रहे और जो पेड़ गिर जाते हैं उनके बदले दूसरे पेड़ भी नहीं लगाए जाते। अभी केजरीवाल जी ने कहा कि 10 लाख पेड़ लगाए जाएंगे दिल्ली में । मैं दावे के साथ कह सकता हूं आने वाले 50 सालों में भी 10 हजार पेड़ भी नहीं लगा सकते। दिल्ली की सड़कों पर देखा जाए तो सड़क के बीचों-बीच गमले पड़े रहते हैं तथा मेट्रो के नीचे जो पेड़ लगाए जाते हैं वह उसमें भी पानी नहीं देते उसको भी वह मेन्टेन नहीं कर पाते। 70 परसेंट पेड़ बिना रख-रखाव के मर जाते हैं और 30 परसेंट बरसातों पर डिपेन्ड रहते हैं। यह पेड़ अपनी किस्मत पर रोते हैं मगर सरकार ईमानदारी से चाहे तो दिल्ली में इतनी जगह है कि लाखों पेड़ लगाए जा सकते हैं। कुछ दिन पहले अखबार पर खबर आई थी दिल्ली के रिज इलाके में लगाए गए कीकर के पेड़ जहरीले और प्रदूषण फैलाते हैं इनके बदले दूसरे पेड़ क्यों नहीं लगाए गए।
इससे क्या सिद्ध होता है कि सरकार पर्यावरण के प्रति कितनी गंभीर है। यह प्रोजेक्ट भी गंगा-यमुना सफाई करने के प्रोजेक्ट कि तरह नेताओं के पैसा खाने का प्रोजेक्ट लगता है। केजरीवाल जी भी बातें ज्यादा काम कम करते नजर आते हैं। जिस भी सरकार ने काम नहीं करना होता वह इसी तरह कभी अफसरों पर कभी राज्यपाल पर इल्जाम लगा कर टाइम पास कर रही है अगला चुनाव जितने के लिए । हिन्दुस्तान के लोग वैसे भी काम को न देखकर हवा के साथ चलते हैं जिधर हवा चल रही है उधर ही वोट दे देती है।
दिल्ली की जनता फिर भी कितनी शरीफ है केजरीवाल जी के थोड़े बहुत काम से ही खुश है अस्पताल, बिजली, पानी स्कूल जोकि थोड़ा ठीक करा है। जो भी सरकार हो यह सब करने का फर्ज बनता है यह कोई एहसान नहीं है लोगों पर। पिछले दिनों हुए एक सर्वे में केजरीवाल जी को 55 परसेंट लोग पसंद कर रहे हैं तो सरकार को बातें कम काम ज्यादा करना चाहिए। 10 लाख पेड़ का वादा करके सरकार 25 परसेंट पेड़ भी लगा दे तो गनीमत है।
नालों की सफाई तथा गटरों की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपए का बजट खा लिया जाता है 10 परसेंट भी नालों और गटरों की सफाई नहीं होती। जो कुड़ा बाहर निकाला जाता है वह बाहर ही रख देते हैं और वही कुड़ा वापस नालों में चला जाता है। अगर सरकार सही ढ़ंग से काम करे तो दिल्ली की जनता इतनी शरीफ है कि वह थोड़े से काम में ही खुश हो जाती है। इसका उदाहरण है पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी जिन्होंने 15 साल काम के दम पर एक छत्र राज किया। अगर राष्ट्रमंडल घोटाला नहीं होता तो आज भी वह राज कर रही होती। भगवान तो सोचता है कि यहां पर लोग अच्छा काम करें और मैं इनको लंबे समय तक राजा बना के रखूं मगर………………………………..।

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