निर्यात को क्यों नहीं मिल पा रही रफ्तार

ex-11111_091619035438.jpgNew Delhi : संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNCTAD के अंतरराष्ट्रीय व्यापार रिपोर्ट 2019 में मिले आंकड़ों और ट्रेंड से यह पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पहले मामूली बढ़त हुई (2012-14), फिर इसमें गिरावट देखी गई (2015 और 2016)  और अंत में इसमें अच्छी मजबूती आई (2017 और 2018). उत्पादन एवं निवेश और कमोडिटी कीमतों में सुधार की वजह से वैश्वि‍क व्यापार में फिर से तेजी आई है.

हालांकि, UNCTAD  ने यह चेतावनी दी है कि भविष्य बहुत सुनहरा नहीं है, क्योंकि आगे वैश्विक उत्पादन में भारी बढ़त होने की गुंजाइश नहीं है और कमोडिटी की कीमतें या तो स्थिर हो जाएंगी या घटने लगेंगी. वित्त वर्ष 2018 की दूसरी छमाही में ही यह देखा जा चुका है कि आर्थिक तरक्की और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रफ्तार सुस्त पड़ गई है.

भारत के लिए भी चुनौतीपूर्ण समय

इसके अलावा, बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के कमजोर पड़ने, चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर, यूरोपीय संघ के भीतर समस्या जैसी कई वजहों से ‘अनिश्चितता बढ़ी’ है और इन सबकी वजह से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के भविष्य के रुख पर दबाव दिख रहा है. इसका मतलब यह है कि भारत के लिए भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण समय आ रहा है. भारत को अपना फोकस कपास, अनाज, मछलियों, मांस जैसे प्राथमिक वस्तुओं और लो-टेक प्रोडक्ट से हटाकर उच्च मूल्य वाली मीडियम और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग वस्तुओं की ओर ले जाना होगा.

उच्च मूल्य वाले वैश्विक निर्यात में भारत का हिस्सा

साल 2008 से 2018 के बीच के व्यापारिक रुख का विश्लेषण करने वाले WTO के वर्ल्ड ट्रेड स्टैटिस्टिकल रीव्यू 2019 के मुताबिक वैश्विक व्यापार में मैन्युफैक्चर्ड वस्तुएं अब भी हावी हैं और इस दौरान उनकी व्यापारिक हिस्सेदारी 66 फीसदी से बढ़कर 68 फीसदी तक पहुंच गई है. इस दौरान ईंधन और खनन उत्पादों का हिस्सा 22 फीसदी से घटकर 19 फीसदी रह गया और कृषि‍ उत्पादों का हिस्सा 8 फीसदी से बढ़कर 10 फीसदी तक पहुंच गया.

व्यापारिक आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि अमेरिकी डॉलर के मद में देखें तो मीडियम और हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग वस्तुएं विश्व निर्यात में प्रभावी स्थान रखती हैं.

इसके विपरीत भारतीय निर्यात में प्राथमिक वस्तुओं और लो टेक्नोलॉजी उत्पादों का बड़ा हिस्सा है. इसके अलावा दवाएं, तेल उत्पाद, ऑटो कम्पोनेंट, डायमंड जैसी ऐसी कई वस्तुएं आयात पर निर्भर हैं.

भारत अब भी डॉलर के मद में वैश्विक निर्यात का 2 फीसदी हिस्सा हासिल करने के लिए जूझ रहा है. साल 2010 से 2018 के बीच उसकी हिस्सेदारी 1.5 से 1.7 फीसदी रही है. शीर्ष हाई वैल्यू वाली वस्तुओं में भी भारत की हिस्सेदारी बहुत कमजोर रही है. शीर्ष 10 हाई वैल्यू वाली वस्तुओं का कुल वैश्विक व्यापार 19,346 अरब डॉलर का हुआ जिसमें भारत का हिस्सा सिर्फ 323.06 अरब डॉलर का या 1.67 फीसदी रहा.

इंडियन कौंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की प्रोफेसर निशा तनेजा इस असंतुलन की ओर संकेत करती हैं. उन्होंने कहा कि साल 2018 में भारतीय निर्यात का करीब 70 फीसदी हिस्सा प्राइमरी और लो टेक्नोलॉजी वाली वस्तुओं का था, जबकि विश्व निर्यात में इनका हिस्सा सिर्फ 40 फीसदी होता है.

इंडस्ट्री चैंबर CII की नेशनल कमिटी ऑन एक्जिम के चेयरमैन संजय बुधिया ने कहा कि विश्व की शीर्ष निर्यात वस्तुओं जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी में भारत का हिस्सा बहुत कम है. साल 2018 में भारत से इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी का निर्यात क्रमश: 11.8 अरब डॉलर और 20 अरब डॉलर का हुआ, जबकि इस दौरान इनका वैश्विक निर्यात क्रमश: 2.8 ट्रिलियन डॉलर और 2.3 ट्रिलियन डॉलर का हुआ. हालांकि खनिज ईंधन, रत्न एवं आभूषण और फार्मा उत्पादों का भारतीय निर्यात ठीक-ठाक रहा है. इसके बावजूद भारत का निर्यात उसके जीडीपी के लिहाज से पर्याप्त नहीं है.

UNCTAD की साल 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का व्यापार असंतुलन वैश्विक स्तर के मुकाबले बहुत ही ज्यादा है. जीडीपी और वैश्विक व्यापार, दोनों के लिहाज से भारत का व्यापार घाटा बहुत ज्यादा है.

आखि‍र क्या है निर्यात के फीके प्रदर्शन की वजह

प्रोफेसर तनेजा बताते हैं कि मैन्युफैक्चर्ड वस्तुओं के निर्यात को मंदा करने वाले कारक काफी समय से मौजूद रहे हैं. उदाहरण के लिए कमजोर बुनियादी ढांचा, बाधित और अपर्याप्त बिजली आपूर्ति, लेनदेन की ऊंची लागत, कठोर श्रम बाजार और श्रमिकों में कुशलता की कमी की वजह से भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को लगातार चोट पहुंचती रही है. दुनिया में अभूतपूर्व तकनीकी बदलाव हो रहे हैं, ऐसे में भारत को पहले से जारी और नई चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (IIFT) के प्रोफेसर बिस्वजीत नाग ने कहा कि भारत को सबसे ज्यादा जरूरत कौशल की है, उसके बाद उत्पादों, प्रकिया, वैल्यू चेन को उन्नत बनाने तथा व्यापा‍रिक बुनियादी ढांचे में सुधार की जरूरत है. उन्होंने कहा कि कौशल विकास इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे रोजगार को निर्यात से जोड़ा जा सकता है. इसके अलावा अब चूंकि उत्पादों का जीवनचक्र कम हो गया है, इसलिए अनुभवों यानी दूसरों की गलतियों से हमें तेजी से सीखना होगा. इसके अलावा, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इनोवेशन को व्यापार, व्यापार को वैश्विक वैल्यू चेन और स्किल से ट्रेड को जोड़ने के लिए नीतियों और प्रोत्साहन की जरूरत है. इसके अलावा बुनियादी ढांचे के विकास के लिए समग्र रवैया अपनाना होगा.

नीति आयोग की रणनीति न्यू इंडिया@75 के मुताबिक निर्यात में एक बड़ी बाधा ऊंची लॉजिस्टिकक लागत है. इसके मुताबिक भारत में लॉजिस्टिक की लागत जीडीपी के 14 फीसदी तक है, चीन के अलावा अन्य सभी देशों में यह काफी कम है. लॉजिस्टिक लागत में 10 फीसदी की कटौती करने से निर्यात में 5 से 8 फीसदी की बढ़त की जा सकती है.

भविष्य में इन क्षेत्रों पर देना होगा ध्यान

प्रोफेसर तनेजा कहते हैं कि नई टेक्नोलॉजी में इस बात की क्षमता है कि वह व्यापार में भारी बदलाव करे जिसमें भारत पिछड़ रहा है. न केवल, भारत को परंपरागत वस्तु निर्यात से निपटने के लिए नई टेक्नोलॉजी को अपनाना होगा, बल्कि उसे अपने वैल्यू चेन और मीडियम एवं हाईटेक वस्तुओं के निर्यात को आगे बढ़ाना होगा ताकि विश्व निर्यात में हमारा हिस्सा उपयुक्त हो सके. भारत की ट्रेड पॉलिसी को इस तरह के लक्ष्यों के लिए तैयार करना होगा.

ICRIER की साल 2019 की एक स्टडी कहती है कि इंटरमीडिएट गुड्स में वैश्विक व्यापार बढ़ रहा है, और यह कुल व्यापार में करीब दो-तिहाई हिस्सा रखते हैं. साथ ही, ऐसी वस्तुओं के निर्यात के मामले में भारत का हिस्सा भी साल 2011 में कुल निर्यात के 31.18%  से बढ़कर साल 2016 में 32.52% तक पहुंच गया है. इसमें उन 15 इंटरमीडिएट मार्केट कॉम्बिनेशन की पहचान की गई है, जहां भारत सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी है-केमिकल्स, आयरन एवं स्टील आर्टिकल्स, ग्लास प्रोडक्ट, प्लास्टिक, लेदर इंटरमीडिएटरी इनपुट, कॉटन यार्न आदि. इन वस्तुओं के निर्यात के लिए यूरोप सबसे अच्छा गंतव्य हो सकता है.

ये हो सकते हैं उपाय

CII के बुधि‍या हाई वैल्यू वाले उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय बताते हैं: बाजार प्रोत्साहन और व्यापार को बढ़ावा, आरऐंडडी में निजी क्षेत्र का ज्यादा निवेश, कारोबारी सुगमता की निगरानी के लिए बोर्ड, प्रमुख सेक्टर में एफडीआई, वित्तीय प्रोत्साहन के द्वारा इनोवेशन में ज्यादा निवेश और विशेष नीतियों के द्वारा चुनींदा सेक्टर तथा उत्पादों की पहचान करना और उन्हें प्रोत्साहित करना.

लेकिन इन सबका यह मतलब नहीं है कि भारत प्राथ‍मिक वस्तुओं के निर्यात को नजरअंदाज कर दे. हालांकि, नीति आयोग की न्यू इंडिया@75 की रणनीति में जो विवरण दिया गया है, वह इस बात का जबरदस्त उदाहरण है कि भारत का निर्यात क्यों पिछड़ रहा है और सरकार का रवैया क्या है: ‘सभी पक्षों से राय लेकर, भारत सरकार को एक सुसंगत और स्थि‍र कृषि‍ निर्यात नीति बनानी चाहिए, पांच से दस साल की अवधि‍ के लिए और मध्यावधि‍ समीक्षा के प्रावधानों के साथ. इसे हासिल करने के लिए तत्काल प्रयास किए जाने चाहिए.

souce by : aajtak

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