कैसे लगेगी भ्रष्टाचार पर लगाम?

भ्रष्टाचार की बातें तो हर कोई करता है, चाहे वह नेता हो या मीडिया या सरकारी अधिकारी या फिर देश का आम आदमी परन्तु क्यों होता है भ्रष्टाचार और कौन रोकेगा इसे, यह अपने आप में एक बहुत बड़ा सवाल है। नेता कहते हैं हमको वोट दीजिये तो हम भ्रष्टाचार को बन्द कर देंगे। अफसर लोग भी कहते हैं कि हमारे तो हाथ ही बंधे हुए हैं, हमारे हाथों में सबकुछ दे दीजिये तो हम भ्रष्टाचार को बन्द कर देंगे। वहीं मीडिया कहती है कि सिर्फ हम ईमानदार हैं और बाकी सब के सब चोर हैं जबकि देश का आम आदमी इसका शिकार भी है और स्रोत भी वही है। हमें भ्रष्टाचार पर आगे बातें करने से पहले यह जानना जरूरी है कि भ्रष्टाचार कहां से शुरू होता है और क्यों होता है। हमारे देश में भ्रष्टाचार की बहुत बड़ी वजह है बेरोजगारी। हमारे देश का नौजवान अपने बाप दादा के मेहनत से अर्जित पैसे से या बैंक से लोन लेकर बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करने के बाद जब वह नौकरी की तलाश में निकलता है तब उसे उतने पैसे भी नहीं दिये जाते जो उसे डिग्री हासिल करने में खर्च हुए पैसे के ब्याज के बराबर भी हों। इसके अलावा अगर हमारे किसी नौजवान को सरकारी नौकरी मिलती भी है तो अच्छी खासी डिग्री होने के बाद भी उसे यह पाने के लिये चढ़ावा देना ही पड़ता है। फिर इस चढ़ावे की राशि का इंतजाम देश का अधिकांश आदमी या तो कर्जा लेकर करता है या अपने पुरखों की अर्जित संपत्ति को बेचकर। जब कोई नौजवान मेहनत करके डिग्री हासिल करने के बाद सरकारी नौकरी पाने के लिये रिश्वत देने को मजबूर होता है, उस समय हमारे देश के सिस्टम के प्रति जो भी आदर व सम्मान उसके मन में वर्षों से संचित होता है, वह सब एक झटके में खत्म हो जाता है। यही हाल हमारे राजनेताओं का भी है। राजनीति में आने से पहले हर युवा यही सोचता है कि मैं एक दिन का मुख्यमंत्री बनकर अनिल कपूर की तरह क्रांति ला दूंगा। फिर पूरे सिस्टम को रातोंरात ऐसे बदल दूंगा कि दुनियां से भ्रष्टाचार का नामोनिशान ही मिट जायेगा। परन्तु उसका सपना वहीं से टूटना शुरू हो जाता है जब उसे कुर्सी तक पहुंचने के लिये करोड़ों रूपये की जरूरत होती है। फिर भी वह अपने सिद्धान्तों के साथ समझौता करते हुए किसी भी तरह से पैसे का जुगाड़ करना चाहता है जिसके लिये उसे बड़े-बड़े भ्रष्टाचारियों व माफियाओं का सहारा लेना ही पड़ता है। उसके बाद में उसे कुर्सी तो मिल जाती है परन्तु उसकी वह कुर्सी उन भ्रष्टाचारियों व माफियाओं के अहसानों तले दबी होती है जिसे चुकाना उसका धर्म हो जाता है। उसके बाद में बच जाता है मीडिया जो हमेशा भ्रष्टाचार के ऊपर से पर्दा उठाने की बात करता है। इस वजह से देशभक्ति से प्रेरित हमारे युवा मीडिया की तरफ अपना रूख कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मीडिया के साथ खुद को जोड़कर आने वाले समय में वह भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद बन जाएंगे परन्तु जब वह इस राह में अपना कदम आगे बढ़ाता है तब देखता है कि मीडिया के अन्दर तो और भी ज्यादा भ्रष्टाचार है। उसे न्यूज भी ऐसी लाने को कहा जाता है जो नेताओं और माफियों की काली करतूतों पर पर्दा डालने वाली हो क्योंकि ऐसी न्यूज को प्रकाशित करने के बदले में नेताओं और माफियाओं से अच्छी खासी रकम भी मिल जाती है। उसके बाद हमारा यह नौजवान उनकी काली करतूतों पर पर्दा डालने के बजाय उन का एजेंट बन कर रह जाता है। इतना ही नहीं, पुलिस थाने से लेकर सभी भ्रष्ट अफसरों व नेताओं के साथ उसके मित्रावत संबंध हो जाते हैं जिसके खिलाफ आवाज उठाने के इरादे से वह यहां आया था। साथ ही, उसके हर काले कारनामों में हमारे मीडियाकर्मी मयस्थता करते हुए भी देखे जा रहे हैं जिस कारण कुछ ही दिनों में उन अफसरों और नेताओं की मेहरबानी से ये देश के एक आम आदमी से अमीर बनने तक का सफर ये भी आसानी से तय कर लेते हैं। यही है हमारे आज के युवाओं की सच्ची कहानी जो भ्रष्टाचार को खत्म करने का सपना लेकर जरूर निकलता है परन्तु उसके कदम खुद ब खुद वहीं पहुंचते जा रहे हैं जहां वह कभी जाना नहीं चाहता था। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाली हमारी जंग कभी पूरी हो पायेगी? अगर नहीं तो क्या हमें इससे लड़ने के बजाय स्वीकार कर लेना चाहिये या नहीं। तो फिर हम क्या करें? यह सवाल आज अनुत्तरित है, जिसके जवाब की तलाश हम सबको है।

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