ईयू ने अल्फांसो इंपोर्ट पर लगी पाबंदी हटाई

नई दिल्ली : यूरोपीय बाजार में अल्फांसो आम के इंपोर्ट पर लगी पाबंदी हटा ली गई है। यूरोपीयन कमीशन ने पिछले साल मई महीने में भारतीय अल्फांसो आम के इंपोर्ट पर पाबंदी लगाई थी, जिसे मंगलवार को हटा लिया गया। इंस्पेक्शन फैसिलिटीज से संतुष्ट होने के बाद यूरोपीय कमीशन ने यह फैसला लिया है। महीने भर के भीतर नए नियमों को लागू कर दिया जाएगा। हालांकि करैला, बैंगन, चिचिंडा और अरबी के इंपोर्ट पर पांबदी जारी रहेगी। अल्फांसो आम पर लगी पाबंदी हटाए जाने से भारत को आंशिक तौर पर जरूर राहत मिली है।
इंपोर्ट पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ एकतरफा वोटिंग के बाद यूरोपीय आयोग (ईसी) ने कहा, ‘भारत के मैंगो एक्सपोर्ट सिस्टम में बड़ा सुधार दिखा है।’ पिछले साल सितंबर में ईसी के फूड एंड वेटेरनरी ऑफिस की टीम ने भारत का दौरा कर सब्जियों एवं फलों के पैक हाउस, प्लांट हेल्थ कंट्रोल और सर्टिफिकेशन सिस्टम का जायजा लिया था। एफवीओ टीम की रिपोर्ट के आधार पर ही ईसी ने अल्फांसो इंपोर्ट पर प्रतिबंध हटाने का फैसला लिया। भारत सरकार के एक अधिकारी ने ईटी को बताया, ‘हम इससे बेहद खुश हैं कि उन्होंने आम से प्रतिबंध हटा लिया है, लेकिन अभी तक हमारी आधी चिंता ही दूर हो पाई है।’
पिछले साल अप्रैल महीने में 28 सदस्यीय यूरोपीय यूनियन ने 1 मई 2004 से दिसंबर 2015 तक अल्फांसो के साथ भारत की चार सब्जियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सर्टिफिकेशन सिस्टम में खामियों के आधार पर ईयू ने यह प्रतिबंध लगाया था। 2013 में करीब फलों और सब्जियों के 207 कंसाइनमेंट संक्रमित पाए गए थे। भारत में ब्रिटेन के हाई कमिश्नर जेम्स बीवन ने कहा, ‘ब्रिटीश सरकार ने प्रतिबंध हटाने की दिशा में काफी मेहनत की। प्रतिबंध का हटाया जाना ब्रिटेन-भारत और यूरोपीय यूनियन-भारत के व्यापारिक संबंधों के लिए अच्छी खबर है।’ ईयू को दी गई अपनी रिपोर्ट में एफवीओ ने भारत सरकार की तरफ से उठाए गए कई कदमों को लेकर सहमति जताई थी जिसमें कैपेसिटी के साथ जांच करने वाले अधिकारियों की संख्या में बढ़ोतरी करना, इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और सेफ एक्सपोर्ट के उपाय लागू करना शामिल है। ईयू के इस फैसले से अल्फांसो एक्सपोर्टर्स भी खुश हैं। बैन लगने के बाद उन्हें खाड़ी देशों के साथ घरेलू बाजार में अपने प्रॉडक्ट को सस्ती कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा था। ब्रिटेन सालाना भारत से 1.6 करोड़ आम की खरीदारी करता है।
स्रोत : इकनॉमिक टाइम्स

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