इम्पोर्टरों को एसएमएस से मिलेगी सामान पहुंचने की जानकारी

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नई दिल्ली। इंडस्ट्री अक्सर फैसले लेने, अमल करने और मंजूरी देने में कस्टम्स के सुस्त होने की शिकायत करती रहती है, लेकिन क्लियरेंस में तेजी लाने के लिए सहयोग करने की बात आती है तो उसका रवैया एकदम बदल जाता है। देश के बड़े बंदरगाहों में शुमार नावा शेवा पर सामानों के जल्द क्लीयरेंस के लिए हाल के दिनों में प्रस्तावित नई व्यवस्था (वार्फ टु वेयरहाउस) को लेकर विरोध हुआ। इस नई व्यवस्था को लेकर कंपनियां इतना टालमटोल कर रही थीं कि सीमा शुल्क के स्थानीय अधिकारियों को उसके लिए राजी करने को 500 कंपनियों के सीईओ को लेटर भेजना पड़ गया। इन कंपनियों में कुछ मल्टीनेशनल भी शामिल हैं।

कस्टम्स डिपार्टमेंट ने इंडस्ट्री के टालमटोल को नजरअंदाज करते हुए एसएमएस सर्विस शुरू करने का प्लान बनाया है। इस सर्विस में इंपोर्टर्स को एसएमएस करके पहले ही बता दिया जाएगा कि उनका सामान ला रहा जहाज कब बंदरगाह पर पहुंचेगा। कस्टम्स विभाग के एक सीनियर अफसर ने हम एक नया सिस्टम लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं जिसमें बिल आॅफ एंट्री एडवांस में फाइल होने पर ट्रेडर को एडवांस में पता चल जाएगा कि उसका सामान कब पोर्ट पर आ रहा है और वह कब डिलीवरी ले सकता है।
आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि कंटेनर को बंदरगाह से कारखानों में पहुंचने में लगने वाला औसत समय वर्ल्ड बैंक के 2016 के डूइंग बिजनेस के आंकड़ों के मुताबिक 307 घंटे से घटकर अप्रैल में 100 घंटा रह गया। इसमें भी औसत भले ही 100 घंटा है लेकिन 70 पर्सेंट कार्गो को कस्टम्स डिपार्टमेंट तुरंत क्लीयर कर देता है और बाकी बचे कार्गो के बड़े हिस्से का क्लीयरेंस 48 घंटे में हो जाता है। कस्टम्स डिपार्टमेंट चाहता है कि इस सिस्टम को आगे बढ़ाया जाए। वह चाहता है कि कार्गो पोर्ट पर ना रुके और कंपनियों की ट्रांजैक्शन कॉस्ट में कमी आए। डिपार्टमेंट कुछ जोखिमों के आधार पर सामानों के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस व्यवस्था की है। इसमें इंपोर्टर्स को ड्यूटी भुगतान या दूसरी जरूरी जांच बिना अपना सामान निकलवाने की इजाजत होती है बशर्ते उनका इंपोर्ट जोखिम वाली कैटेगरी में नहीं आता हो।
नावा शेवा के दूसरे कस्टम्स अधिकारी ने कहा, हमने कंपनियों के सीईओ को लिखकर यह बताने की कोशिश की है कि कैसे यह नया प्रोग्राम उनकी बचत करा सकता है। हमने इस सर्विस के फायदे के बारे में बताने के लिए उनके चीफ फाइनेंशियल आॅफिसर्स से बात भी की है। हम बंदरगाह से सामान का क्लीयरेंस कराना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि हम नहीं चाहते कि बंदरगाहों का इस्तेमाल गोदाम की तरह किया जाए। कंपनियों ने कस्टर्म्स को एडवांस में बिल आॅफ एंट्री फाइल करने में होने वाली दिक्कतों के बारे में बताया है। उन्होंने कहा कि उनको कई बार ये पता नहीं होता है कि कंटेनर में क्या सामान है। इस पर कस्टम्स वाले कंपनियों से अपना सिस्टम सुधारने के लिए कह रहे हैं।

सौजन्य से : नवभारत टाइम्स

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