आत्म सुख

भगवान श्री रामचंद्र जी को जब राजा दशरथ की तरफ से वन जाने की आज्ञा हुई तो उन्होंने माता सीता को वन के भयंकर दुःखों से अवगत कराया और समझाते हुए फरमाया कि आप यहां महलों में रहो, मैं अवधि समाप्त कर शीघ्र ही वापस लौट आऊंगा । यह सुनकर माता सीता ने विनीत भाव से उत्तर दिया कि आपके बिना मुझे महल के सुख भोग वन के दुःखों से भी अधिक दुःखदायी प्रतीत होंगे। आपके साथ आपके चरणों में वन में रहना महलों से कहीं अधिक सुखदायी प्रतीत होंगे। भाव यह कि जिन जिनको भी इस आत्मसुख की अनुभूति हुई उन्होंने दुनिया के मिथ्या सुखों को इस अमर सुख पर न्योछावर कर दिया।
याज्ञवल्कय जी राजऋषि थे। उन्हें बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के द्वारा अथाह स्वर्ण मुद्राएं एवं बहुमूल्य आभूषण इत्यादि भेंटस्वरुप मिले थे। वृद्धावस्था आने पर उन्होंने विचार किया कि अभी वन में जाकर एकांत में भजन करके अपने अंतिम समय को आनन्द में गुजारुं। उनकी दो पत्नियां थी, एक मैत्रेयी और दूसरी कात्यायनी। उन्होंने दोनों को बुलाकर प्रेमसहित कहा कि आप इस अपार धन राशि को बांटकर ले लेवें क्योंकि मेरा विचार अब वन में जाकर भजन बन्दगी करने का है।
मैत्रेयी ने विनती कि आप यह सारा धन कात्यायनी को सौंप दे और मुझे अपने साथ वन में ले चले। ऋषि याज्ञवल्कय जी ने कहा कि वन के दुःख तुमसे सहन न हो सकेगे इसलिए हमारे विचार में तुम यही रहो। मैत्रेयी ने कहा कि मामूली समझ वाला इन्सान भी सुख को छोड़कर दुःख की ओर मुख नहीं करता फिर आप तो विद्धानों के भी शिरोमणि हैं। आप इतनी धनसम्पदा का त्याग करके यदि वन में जा रहे हैं तो अवश्य ही किसी ऐसे सुख की प्राप्ति हेतु जा रहे होंगे जो इतनी धन सम्पदा से भी प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए मुझे भी उस आनन्द की ही चाहना है जिसके लिए आप राजा महाराजाओं से मिलने वाले मान-सम्मान व धन की परवाह किए बिना वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं।
ऋषि याज्ञवल्कय जी मैत्रेयी को अधिकारी जानकर अपने साथ ले गये। वन में ऋषि जी की पावन संगति में उसने वह आत्म सुख पाया जो शाश्वत और अविनाशी था, जिसका कभी भी नाश नहीं हो सकता था। कात्यायनी को धन तो मिला लेकिन उसके दुःखदायी परिणाम से वह वंचित न रह सकी।
सूक्तावली में फरमाया है कि सांसारिक धन तीनों काल में दुःखदायी होता है। सर्वप्रथम तो धन उपार्जन करने में दुःख सहना पड़ता है, फिर उसकी रक्षा करने की कठिनाई और जब खर्च होकर नष्ट होता है तब भी अपार दुःख का कारण बनता है। कात्यायनी की भी यही दशा हुई। अन्ततः ऋषि पराशर जी से ज्ञान प्राप्त कर उसने सच्चा सुख प्राप्त किया। जिन भाग्यशाली गुरुमुखों को पूर्ण महापुरुषों की राहबरी मिल जाती है वे जगत को झूठ समझकर उसे दिल में स्थान नही देते।
एक सेवक को किसी दुष्ट आदमी ने बिना किसी वजह के खूब परेशान किया। बात जज के कानों तक पहुंची। उसने फैसला दिया कि यह सेवक स्वयं अपने विचार से जो सजा निश्चित करेगा, उस दुष्ट को वही सजा सुना दी जाएगी। उसने बिना किसी कारण के सेवक को सताया है इसलिए उसे इसका परिणाम भी भुगतना पड़ेगा। यह सुनकर सेवक ने कहा कि इस आदमी को ढेर सारा धन देकर छोड़ दिया जाए। जज यह सुनकर बड़ा हैरान हुआ और बोला कि मैंने तुम्हें इस सजा देने को कहा था, न कि पुरस्कार देने के लिए।
सेवक ने कहा कि मैंने सोच समझकर इसे बड़ी से बड़ी ही सजा दी है क्योंकि धन ही सब विपदाओं का मूल है। इसलिए जब इसके पास धन आएगा तो निश्चय रुप से आपदाएं भी साथ लेकर ही आएगा। ऐसे में जीव आत्म सुख की कल्पना भी नहीं कर सकता। फिर यह धन पुरस्कार कैसे हुआ ?
ये हैं उनकी दुनिया के न्यारे फैसले। जो सद्गुरु के नाम का सच्चा धन एकत्र करते हैं वे सदैव आत्म सुख से सराबोर रहते हैं। दुनिया के झूठे धन की वे तनिक भी परवाह नहीं करते।
एक सेवक गर्मी के दिनांे में छत पर सोया हुआ था। रात को चोर उसके घर का सारा धन माल चुराकर ले गए। प्रातः जब वह नीचे उतरा तो सब कुछ चोरी हुआ देखकर जोर-जोर से हंसने लगा। उसे हंसता देखकर लोगों ने हैरान होकर उसके हंसने का कारण पूछा। कहने लगा कि सब कुछ चोरी हो जाने पर भी मैं लाभ में हूं क्योंकि जब मैं इस दुनिया में आया था तब मैं निर्वस्त्र था लेकिन अब मैंने शरीर पर ये वस्त्र धारण कर रखे हैं। इसलिए अब भी मैं लाभ में ही हूं।
ऐसा सांत्वना भरा उत्तर पाकर वे सब उस सेवक के चरणों में नत मस्तक हो गए और कहने लगे कि आप धन्य हैं, आपने सच्ची सम्पदा एकत्र कर रखी है। भगवान की रजा में राजी रहना सीख लिया है। मालिक कि प्रेरणा से उन सबने उसे पुराने सामान के बदले नया सामान व कपड़े इत्यादि खरीद करके दिए। कुछ दिनों के पश्चात् वह चोर भी पकड़े गये। उनसे भी सारा सामान वापिस ले लिया गया। इस प्रकार प्रभु के प्यारे यहां भी सकुशल रहते हैं और आत्म सुख से मालोमाल होकर अपना परलोक भी सुहेला कर जाते हैं।

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